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डोकलाम के बाद चीनी सेना का तिब्बत में पहला युद्धाभ्यास, 1962 का भारत-चीन युद्ध भी आया याद

तिब्बत में तैनात चीनी सेना ने दूरवर्ती हिमालयी क्षेत्र में अपने साजो-सामान, हथियारों को समर्थन देने की क्षमताओं और सैन्य-असैन्य एकीकरण का निरीक्षण करने के लिए अभ्यास किया...

Bhasha Bhasha
Updated on: June 29, 2018 17:09 IST
China holds drill in Tibet for military-civilian integration, also test logistics and weapon support- India TV
China holds drill in Tibet for military-civilian integration, also test logistics and weapon support | AP

बीजिंग: तिब्बत में तैनात चीनी सेना ने दूरवर्ती हिमालयी क्षेत्र में अपने साजो-सामान, हथियारों को समर्थन देने की क्षमताओं और सैन्य-असैन्य एकीकरण का निरीक्षण करने के लिए अभ्यास किया। आधिकारिक मीडिया ने बीजिंग में एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने मंगलवार को यह अभ्यास किया जो डोकलाम गतिरोध के बाद से तिब्बत में इस तरह का पहला अभ्यास है। अभ्यास की जानकारी देने वाले चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि PLA ने पिछले साल अगस्त में 4,600 मीटर की ऊंचाई पर 13 घंटे तक अभ्यास किया था।

अपनाई गई सैन्य-असैन्य एकीकरण की रणनीति

रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्लेषकों ने मंगलवार को किए गए अभ्यास की प्रशंसा करते हुए इसे सैन्य-असैन्य एकीकरण की ओर महत्वपूर्ण कदम बताया और नए युग में मजबूत सेना का निर्माण करने के देश के लक्ष्य को हासिल करने की रणनीति बताया। यह अभ्यास स्थानीय कंपनियों और सरकार के सहयोग से किया गया। अभ्यास की मुख्य बात सैन्य-असैन्य एकीकरण की रणनीति है जो तिब्बत में अहम बात है जहां दलाई लामा की विरासत अब भी कायम है। 

तिब्बत की विषम जलवायु में अभ्यास
रिपोर्ट में कहा गया है कि तिब्बत के पठार में विषम जलवायु है और उसकी भौगोलिक स्थिति भी जटिल है। लंबे समय से वहां सैनिकों को साजो-सामान और हथियार सहयोग मुहैया कराना बहुत मुश्किल है। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने कमांड लॉजिस्टिक सपोर्ट डिपार्टमेंट के प्रमुख झांग वेनलोंग के हवाले से बताया कि विषम परिस्थितियों में सैनिकों के बचे रहने, आपूर्ति, बचाव, आपात रखरखाव और सड़क सुरक्षा में परेशानियों को हल करने के लिए सेना ने सैन्य-असैन्य एकीकरण की रणनीति अपनाई है।

चीन को याद आई 1962 की लड़ाई
सैन्य विशेषज्ञ सोंग झोंगपिंग ने ग्लोबल टाइम्स से कहा, ‘अत्यधिक ऊंचाई पर लड़ाई में सबसे बड़ी चुनौती सतत साजो-सामान और हथियार को सहयोग मुहैया कराना है। वर्ष 1962 में चीन-भारत सीमा संघर्ष में चीन पर्याप्त साजो-सामान मुहैया ना होने की वजह से इस जीत का पूरा फायदा उठाने में विफल रहा। हालांकि स्थानीय तिब्बती निवासियों ने अस्थाई सहयोग के तौर पर सैनिक मुहैया कराए लेकिन वह सतत नहीं था। यह अभ्यास दिखाता है कि सैन्य-असैन्य एकीकरण साध्य रणनीति है और यह मजबूत युद्ध शक्ति बनाने में मदद कर सकती है।’

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