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आज है 'संकष्टी चतुर्थी', इस तरह से करें भगवान गणेश की पूजा बनेंगे कई बिगड़े हुए काम

प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने से आपके सभी संकट दूर हो जाते हैं और इसी वजह से इसे संकट हारा चतुर्थी भी कहते हैं। 

India TV Lifestyle Desk India TV Lifestyle Desk
Published on: June 30, 2018 18:06 IST
संकष्टी चतुर्थी- India TV
संकष्टी चतुर्थी

धर्म डेस्क: प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा अर्चना करने से आपके सभी संकट दूर हो जाते हैं और इसी वजह से इसे संकट हारा चतुर्थी भी कहते हैं। चूंकि यह चतुर्थी हर माह मनाई जाती है, इस वजह से भगवान गणेश के कई रूपों की पूजा होती है।

शुक्ल पक्ष में आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। इसे संकट हारा, अंगारकी चतुर्थी और गणेश चतुर्थी आदि के नाम से भी जाना जाता है। यदि यह चतुर्थी कृष्ण पक्ष के मंगलवार को पड़ती है तो इसे अंगारकी संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इस दिन गणेश के भक्त उपवास रखते हैं। भगवान गणेश को बल, बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। यह अपने भक्तों के सभी विघ्न हर लेते हैं। इसलिए इन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश का जन्मदिवस है और इस दिन को भारत के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न नामों धूमधाम से मनाया जाता है। संकष्टी चतुर्थी का व्रत बहुत कठीन होता है। इस व्रत में केवल फलों का ही सेवन किया जा सकता है। इसके अलावा मूंगफली, साबूदाना आदि भी खाया जा सकता है। यह उपवास चंद्रमा को देखकर तोड़ा जाता है।

इस दिन जब आप उपवास रखें तो भगवान गणेश की कथा जरूर सुनें। ऐसा करने से ही आपकी पूजा सफल होगी। इस उपवास को करने वाले व्यक्ति को सुबह नहा धोकर लाल रंग का कपड़ा पहनना चाहिए। पूजा के दौरान फल-फूल आदि चढ़ाएं और गणेश की अराधना करें। गणेश को मोदक का भोग जरूर लगाएं। पूरे विधि विधान से पूजा करने के बाद गणेश मंत्र ओम गणेशाय नमः का जाप करें। यह जाप आप 108 बार करें।

क्यों मनाते हैं संकष्टी चतुर्थी

संकष्टी चतर्थी मनाने के पीछे कई मान्यताएं हैं जिनमें से एक यह भी प्रचलित है कि एक दिन माता पार्वती और भगवान शिव नदी किनारे बैठे हुए थे। और अचानक ही माता पार्वती का मन चोपड़ खेलने का हुआ। लेकिन उस समय वहां पार्वती और शिव के अलावा और कोई तीसरा नहीं था, ऐसे में कोई तीसरा व्यक्ति चाहिए था जो हार-जीत का फैसला कर सके। इस वजह से दोनों ने एक मिट्टी मूर्ति बनाकर उसमें जान फूंक दी। और उसे शिव व पार्वती के बीच हार जीत का फैसला करने को कहा।

चोपड़ के खेल में माता पार्वती विजयी हुईं। यह खेल लगातार चलता रहा जिसमें तीन से चार बार माता पार्वती जीतीं लेकिन एक बार बालक ने गलती से पार्वती को हारा हुआ और शिव को विजयी घोषित कर दिया। इस पर माता पार्वती क्रोधित हुईं। और उस बालक को लंगड़ा बना दिया। बच्चे ने अपनी गलती की माफी भी माता पार्वती से मांगी और कहा कि मुझसे गलती हो गई मुझे माफ कर दो। लेकिन माता पार्वती उस समय गुस्से में थीं और बालक की एक ना सुनी। और माता पार्वती ने कहा कि श्राप अब वापस नहीं लिया जा सकता। लेकिन एक उपाय है जो तुम्हें इससे मुक्ति दिला सकता है। और कहा कि इस जगह पर संकष्टी के दिन कुछ कन्याएं पूजा करने आती हैं।

तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को करना। बालक ने वैसा ही किया जैसा माता पार्वती ने कहा था। बालक की पूजा से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और बालक की मनोकामाना पूरी करते हैं। इस कथा से यह मालूम होत है कि गणेश की पूजा यदि पूरी श्रद्धा से की जाए तो सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

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