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162 साल पहले मेरठ ने दी थी आजादी की चिंगारी को हवा, कोतवाल धनसिंह ने भी दिया था विशेष योगदान

1857 की क्रांति की शुरुआत वर्तमान उत्तर प्रदेश के मेरठ से हुई थी। यहीं से अंग्रेज सरकार के खिलाफ पहली बार 10 मई 1857 को स्वतंत्रता का बिगुल फूंका गया था। 

India TV News Desk India TV News Desk
Published on: May 10, 2019 20:50 IST
MEERUT- India TV
Image Source : MEERUT.NIC.IN मेरठ  से भड़की थी आजादी की चिंगारी

मेरठ। देश को आजाद हुए 70 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। देश की आजादी में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार बल्लभ भाई पटेल सहित सैकड़ों ऐसा नेताओं का विशेष योगदान था, जिनके नाम आप और हम जानते हैं। देश की आजादी की लड़ाई में हजारों ऐसे गुमनाम लोगों ने भी हिस्सा लिया, जिन्हें कोई जानता।

ऐसी ही एक क्रांति शुरू हुए आज से 162 साल पहले साल 1857 में जिसमें हजारों ऐसे लोगों ने हिस्सा लिया, जिन्हें कोई नहीं जानता। इन क्रांतिकारियों ने 1857 में न सिर्फ अंग्रेजी सरकार के होश उड़ा दिए बल्कि एक ऐसी चिंगारी को हवा दे दी, जिसे अंग्रेज लाख कोशिश के बावजूद बुझा न पाए। जिसके बाद पूरा देश पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक आजादी के आंदोलन में अपनी कूद पड़ा। इसीलिए आज पूरा देश 1857 की क्रांति में हिस्सा लेने वादों को याद कर रहा है।

मेरठ से शुरु हुई 1857 की क्रांति

1857 की क्रांति की शुरुआत वर्तमान उत्तर प्रदेश के मेरठ से हुई थी। यहीं से अंग्रेज सरकार के खिलाफ पहली बार 10 मई 1857 को स्वतंत्रता का बिगुल फूंका गया था। दरअसल 10 मई 1857 के दिन अंग्रेज सेना में काम करने वाले भारतीय सिपाहियों ने मेरठ कैंट में 50 अंग्रेज सिपाहियों को मार डाला था। इतिहासकारों के अनुसार, इस विद्रोह की भूमिका काफी दिन पहले से बन रही थी। भारतीय सैनिकों की नाराजगी की बड़ी वजह वो आदेश था जिसकी वजह से उन कारतूसों को चलाने के लिए कहा गया जो गाय और सूअर के मांस से बने थे। जिसके चलते अंग्रेज सेना में काम करने वाले भारत के सभी सिपाही बेहद नाराज थे। सैनिकों को लग रहा था कि गोरी सरकार जान-बूझकर उन्हें परेशान कर रही है।

कोतवाल धनसिंह ने की क्रांतिकारियों की मदद

1857 की क्रांति में कोतवाल धनसिंह का अहम योगदान था। क्रांति के समय अंग्रेज अफसरों के आदेश के बावजूद धनसिंह ने क्रांतिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। इस दौरान धन सिंह कोतवाल ने अपनी जान पर खेलकर क्रांतिकारियों को अहम सुचनाएं भी पहुंचाईं। इसी लिए अंग्रेज सरकार ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई।

मंगल पांडे का था विशेष योगदान

1857 की क्रांति में शहीद मंगल पांडे का भी विशेष योगदान है। अंग्रेजी सेना में सिपाही मंगल पाडे ने 29 मार्च 1857 को बंगाल की बैरकपुर छावनी में दो अंग्रेज अफसरों पर हमला बोल दिया और फिर खुद को भी गोली मारकर घायल कर लिया, जिसके बाद अंग्रेज हुकूमत ने मंगल पांडे को 7 मार्च 1857 को फांसी दे दी।  इस बात से भी अंग्रेज सेना में भारतीय सिपाही काफी गुस्से में थे।

गांव देहात में भी फैल गया था विद्रोह

1857 की क्रांति में मेरठ के आसपास के गांवों के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस विद्रोह में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेज सरकार के खिलाफ लड़े।

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