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आधी रात को कैसे लगा आपातकाल? इंदिरा की इमरजेंसी की 20 कहानियां

अपने उस रेडियो संदेश में इंदिरा गांधी भले ही देशवासियों से आतंकित नहीं होने को कह रही थी लेकिन इमरजेंसी के दौरान हिंदुस्तान में जो भी हुआ वो सियासी आतंक का पर्याय बनता चला गया। देश के बिगड़े अंदरूनी हालात का हवाला देकर वो सब कुछ हुआ जिसने आपातकाल को हिंदुस्तान के इतिहास का काला अध्याय बना डाला।

IndiaTV Hindi Desk IndiaTV Hindi Desk
Updated on: June 26, 2018 14:20 IST
आधी रात को कैसे लगा आपातकाल?, इंदिरा की इमरजेंसी की 20 कहानियां- India TV
आधी रात को कैसे लगा आपातकाल?, इंदिरा की इमरजेंसी की 20 कहानियां

नई दिल्ली: 25 जून 1975, रात के करीब साढे आठ बजे राजपथ से इंदिरा गांधी का काफिला गुजरा। उस काफिले की मंजिल थी राष्ट्रपति भवन जहां पहुंच कर इंदिरा गांधी ने तब के राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली से देश में आपातकाल लगाने की बात की। कहा कि अगले दो घंटे में मसौदा आप तक पहुंच जाएगा और आपको उस पर साइन करना है। बस इतना बोल कर वो वापस लौट गईं लेकिन राष्ट्रपति के दस्तखत के बाद देश उस दौर में पहुंच गया जिसे आजाद हिंदुस्तान का सबसे काला काल यानी आपातकाल कहा गया। हम आपको उसी आपातकाल की 20 कहानियां बताने जा रहे हैं।

1. सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 25 जून 1975 की शाम को दिल्ली के रामलीला मैदान में राष्ट्रकवि रामधारी सिंग दिनकर की ये कविता जयप्रकाश नारायण के लिए एक ऐसा नारा बन गया जो इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उस दिन दिल्ली के रामलीला मैदान में जेपी की ऐतिहासिक सभा हुई। उस सभा में दिनकर की कविता की लाइनें सिंहासन खाली करो कि जनता आती है जेपी की जुबान से क्या निकला इस नारे की गूंज में इंदिरा गांधी को अपना सिंहासन डोलता नज़र आया। शाम से रात हुई और उसी रात को इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाने का फैसला कर लिया। आनन फानन में आपातकाल के मसौदे को अंतिम रूप दिया गया और आधी रात को ही राष्ट्रपति से दस्तखत करवाया गया। यानी आपातकाल तो रात में ही लग गया लेकिन देश को इसकी खबर अगले दिन इंदिरा गांधी के रेडियो संदेश से लगी।

2. अपने उस रेडियो संदेश में इंदिरा गांधी भले ही देशवासियों से आतंकित नहीं होने को कह रही थी लेकिन इमरजेंसी के दौरान हिंदुस्तान में जो भी हुआ वो सियासी आतंक का पर्याय बनता चला गया। देश के बिगड़े अंदरूनी हालात का हवाला देकर वो सब कुछ हुआ जिसने आपातकाल को हिंदुस्तान के इतिहास का काला अध्याय बना डाला। लोकतंत्र को जैसे हथकड़ी लग गई। प्रेस की आजादी पर सेंसर का पहरा बिठा दिया गया। 25 जून 1975 की उस काली रात के पौ फटने के पहले ही विरोधी दलों के नेताओं को अलग अलग जेलों में डाल दिया गया। नेताओं की गिरफ्तारी में ना उम्र का लिहाज रखा गया, ना ही उनके सेहत का। जय प्रकाश नारायण दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान से तड़के 4 बजे गिरफ्तार हुए। अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, मधु दंडवते बैंगलुरु से गिरफ़्तार हुए तो मोरारजी देसाई, चरण सिंह, विजया राजे सिंधिया, राजनारायण जेल की सलाखों में डाल दिए गए। जो नेता जहां थे, वहीं गिरफ़्तार किए गए। नानाजी देशमुख, जॉर्ज फर्नांडीस, कर्पूरी ठाकुर, सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे नेता अंडरग्राउंड हो गए।

3. इमरजेंसी लगने से पहले इंदिरा गांधी और ख़ासतौर पर संजय गांधी की मंडली ने दो बातों की तैयारी कर ली थी। पहली, किन नेताओं की गिरफ़्तारी करनी है। इस कड़ी में इमरजेंसी के दौरान क़रीब 13 हज़ार छोटे-बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इसके अलावा कुल 1 लाख लोग जेल में डाले गए। इमरजेंसी लगते जो दूसरी बात हुई, वो थी इंदिरा सरकार के ख़िलाफ़ लिखने वाले प्रेस पर कैसे शिकंजा कसना है। कहा जाता है कि इमरजेंसी लगने के दौर में इंदिरा राज में ये संजय गांधी का पहला शक्ति प्रदर्शन था।

4. देश में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भी प्रेस पर इतने क्रूर सेंसरशिप का शिकंजा नहीं कसा गया था जितना कि आपातकाल के दौरान पाबंदी लगी। उन दिनों दिल्ली के बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग पर ज़्यादातर अख़बारों के दफ़्तर थे। प्रेस को सबक सिखाने के लिए 25 जून की आधी रात को बहादुर शाह ज़फ़र मार्ग इलाक़े की बिजली काट दी गई। 26 जून की सुबह ज़्यादातर घरों में अख़बार नहीं पहुंचे। ये हुआ था संजय गांधी और उनकी मंडली के इशारों पर जिसमें हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल, गृह राज्य मंत्री ओम मेहता, दिल्ली के तत्कालीन गवर्नर किशन चंद और इंदिरा गांधी के निजी सचिव आर के धवन शामिल थे।

5. इमरजेंसी के साथ इंदिरा के छोटे बेटे संजय गांधी सर्वेसवा हो गए। सत्ता भले ही इंदिरा के पास थी लेकिन सत्ता की चाबुक संजय गांधी के हाथों में थी। आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने नसबंदी अभियान चलाया। शहर से लेकर गांव-गांव तक नसबंदी शिविर लगाकर लोगों के ऑपरेशन कर दिए गए। ये नसबंदी हुई पुलिस के डर से, प्रशासन के ख़ौफ़ से। कहते हैं कि नसबंदी का आइडिया संजय गांधी को तब आया जब WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने आगाह किया कि अगर भारत की आबादी नहीं रुकी तो देश की सेहत ख़राब हो जाएगी। फिर क्या था, डंडों के ज़ोर पर संजय गांधी के इशारों पर क्या 18 साल के नौजवान और क्या 80 साल के बुज़ुर्ग, सबकी नसबंदी कर दी गई।

6. संजय गांधी के नसबंदी अभियान को दिल्ली के मुस्लिम बाहुल इलाक़ों में रुख़साना सुल्ताना नाम की उनकी दोस्त ने चलाया। ये रुख़साना सुल्ताना फ़िल्म एक्ट्रेस अमृता सिंह की मां थीं। रुख़साना ने अकेले पुरानी दिल्ली इलाक़े में एक साल के भीतक 13 हज़ार लोगों की नसबंदी करवा दी। तब अफ़सरों के साथ-साथ कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों को भी नसबंदी के टारगेट दिए गए। टारगेट पूरा न करने वालों को संजय गांधी के गुस्से का शिकार होना पड़ता था।

7. देश को आगे बढ़ाने के नाम पर संजय गांधी ने जिन फैसलों को देश के उपर थोपा उसमें साफ़-सफाई और दिल्ली को सुंदर बनाने का भी एजेंडा शामिल था। इमरजेंसी के दौरान पुरानी दिल्ली का तुर्कमान गेट इसका गवाह बना। उस दौर में तुर्कमान गेट के आसपास हज़ारों झुग्गियां थीं। संजय गांधी के इशारों पर अप्रैल 1976 में डीडीए के बुलडोज़र तुर्कमान गेट इलाक़े में पहुंच गए। ख़ुद डीडीए के तत्कालीन वाइस चेयरमैन जगमोहन ने झुग्गियां हटाने के अभियान की अगुवाई की। देखते-देखते डीडीए के बुलडोज़रों ने हज़ारों झुग्गियों को ज़मीदोज़ कर दिया। इसे लेकर भारी विरोध हुआ तो पुलिस ने फ़ायरिग कर दी जिसमें शाह कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक 150 लोग मारे गए।

8. इमरजेंसी लगाने के पीछे की सबसे बड़ी वजह इंदिरा गांधी की सत्ता में बने रहने की लालसा को बताया जाता है। दरअसल इमरजेंसी की नींव की सबसे मजबूत ईंट इलाहाबाद हाईकोर्ट का वो मुकदमा बना जो इंदिरा गांधी पर 1971 में हुए लोकसभा के चुनाव में धांधली का आरोप लगाते हुए राजनारायण ने दाखिल किया था। 1971 के चुनाव में राजनारायण उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव में हार गए थे। चुनाव के चार साल बाद राजनारायण ने अदालत में इंदिरा की जीत को चुनौती दी थी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाइकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने ना सिर्फ रायबरेली के उस चुनाव को खारिज कर दिया बल्कि इंदिरा गांधी को दोषी मानते हुए उन पर 6 साल तक चुनाव ना लड़ने की पाबंदी लगा दी।

9. 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस फ़ैसले पर मुहर लगा दी थी, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की छूट दे दी थी। वो लोकसभा में जा सकती थीं लेकिन वोट नहीं कर सकती थीं। कहा जाता है कि उस फ़ैसले के बाद इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया था लेकिन इंदिरा के सहयोगी सिद्धार्थ शंकर रे और संजय गांधी ने उन्हें ऐसा ना करने की सलाह दी। तब इंदिरा कैबिनेट के तमाम सीनियर्स भी इंदिरा के इस्तीफा ना देने के पक्ष में थे। कहा जाता है कि इंदिरा के इसी उहापोह का संजय गांधी और उनके साथियों ने फ़ायदा उठाया। सड़क से सभाओं तक संजय गांधी की प्रायोजित भीड़ इंदिरा के समर्थन में जुटाई गई। इसके पीछे संजय गांधी की मंशा इंदिरा के सामने ये साबित करने की थी कि उनके लिए अभी भी कितना बड़ा जनसमर्थन है।

10. जेपी का भाषण इमरजेंसी का आधार बना लेकिन इसकी पटकथा इंदिरा और सिद्धार्थशंकर राय के दिमाग़ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद से तैयार थी। सिद्धार्थ शंकर राय ने इमरजेंसी लगाने का सुझाव दिया, जिस पर पहले इंदिरा तैयार नहीं थीं लेकिन जेपी की सभा के बाद इंदिरा के घर संजय गांधी, गृह राज्य मंत्री ओम मेहता, हरियाणा के मुख्यमंत्री बंसीलाल की मौजूदगी में सिद्धार्थ शंकर रे ने इमरजेंसी का मसौदा तैयार किया।

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