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सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त किया, मस्जिद के लिए लगभग दोगुनी जमीन दी

शीर्ष अदालत के फैसले का हिन्दू नेताओं और समूहों ने व्यापक स्वागत किया, वहीं मुस्लिम नेतृत्व ने इसमें खामियां बताते हुए कहा कि वे निर्णय को स्वीकार करेंगे। उन्होंने भी शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की। इसके साथ ही राजनीतिक दलों ने कहा कि यह अब आगे बढ़ने का समय है।

Bhasha Bhasha
Published on: November 09, 2019 19:07 IST
Supreme Court Ram Mandir- India TV
Image Source : PTI Police personnel stand guard inside the Supreme Court premises ahead of the court's verdict on Ayodhya land case, in New Delhi.

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शनिवार को ऐतिहासिक फैसले में एक सदी से अधिक पुराने मामले का पटाक्षेप करते हुए अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया और साथ में व्यवस्था दी कि पवित्र नगरी में मस्जिद के लिए पांच एकड़ वैकल्पिक जमीन दी जाए। न्यायालय ने कहा कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन अब केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी, जो इसे सरकार द्वारा बनाए जाने वाले ट्रस्ट को सौंपेंगे।

मंदिर  निर्माण के लिए तीन महीन के भीतर बनेगा ट्रस्ट

पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मत फैसला दिया और कहा कि हिन्दुओं का यह विश्वास निर्विवाद है कि संबंधित स्थल पर ही भगवान राम का जन्म हुआ था तथा वह प्रतीकात्मक रूप से भूमि के मालिक हैं।

‘कारसेवकों द्वारा 16वीं सदी के तीन गुंबद वाले ढांचे को ढहाना गलत’

राजनीतिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील इस मामले ने भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को तार-तार कर दिया था। फैसले में कहा गया कि फिर भी यह स्पष्ट है कि राम मंदिर बनाने गए कारसेवकों द्वारा 16वीं सदी के तीन गुंबद वाले ढांचे को ढहाना गलत था और उसका ‘‘निवारण’’ होना चाहिए।

सभी ने की शांति और सौहार्द की अपील

शीर्ष अदालत के फैसले का हिन्दू नेताओं और समूहों ने व्यापक स्वागत किया, वहीं मुस्लिम नेतृत्व ने इसमें खामियां बताते हुए कहा कि वे निर्णय को स्वीकार करेंगे। उन्होंने भी शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की। इसके साथ ही राजनीतिक दलों ने कहा कि यह अब आगे बढ़ने का समय है।

पीएम मोदी ने की सद्भाव और एकता बनाए रखने की अपील

वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से शांति, सद्भाव और एकता बनाए रखने की अपील करते हुए ट्वीट किया, ‘‘रामभक्ति हो या रहीमभक्ति, ये समय हम सभी के लिए भारतभक्ति की भावना को सशक्त करने का है।’’

सदियों पुराना था अयोध्या विवाद

अयोध्या में संबंधित स्थल पर विवाद सदियों पुराना है जहां मुगल बादशाह बाबर ने या उसकी तरफ से तीन गुंबद वाली बाबरी मस्जिद बनवाई गई थी। हिन्दुओं का मानना है कि मुस्लिम हमलावरों ने वहां स्थित राम मंदिर को नष्ट कर मस्जिद बना दी थी। यह मामला 1885 में तब कानूनी विवाद में तब्दील हो गया था जब एक महंत ने अदालत पहुंचकर मस्जिद के बाहर छत डालने की अनुमति मांगी। यह याचिका खारिज कर दी गई थी।

दिसंबर 1949 में मस्जिद में रखी गई मूर्ति

दिसंबर 1949 में अज्ञात लोगों ने मस्जिद में भगवान राम की मूर्ति रख दी। कारसेवकों की बड़ी भीड़ ने छह दिसंबर 1992 को ढांचे का ध्वस्त कर दिया था। ढांचे को ध्वस्त किए जाने से देश में हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच दंगे भड़क उठे थे और उत्तर भारत तथा मुंबई में अधिक संख्या में दंगे हुए जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए।

मुस्लिमों को मस्जिद के लिए की जाए 5 एकड़ भूमि आवंटित – सुप्रीम कोर्ट

ढांचा ढहाए जाने और दंगों से गुस्साए मुस्लिम चरमपंथियों ने मुंबई में 12 मार्च 1993 को सिलसिलेवार बम विस्फोट किए जिनमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई। न्यायालय ने कहा कि जो गलत हुआ, उसका निवारण किया जाए और पवित्र नगरी अयोध्या में मुसलमानों को मस्जिद के लिए पांच एकड़ का भूखंड आवंटित किया जाए।

‘विवादित 2.77 एकड़ जमीन अब केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी’

न्यायालय ने कहा कि विवादित 2.77 एकड़ जमीन अब केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी, जो इसे सरकार द्वारा बनाए जाने वाले ट्रस्ट को सौंपेंगे। पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट बनाया जाना चाहिए। फैसले में कहा गया कि यह धर्म और विश्वास से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसकी जगह मामले को तीन पक्षों-रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़े और सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड के बीच भूमि के स्वामित्व से जुड़े वाद के रूप में देखा गया।

40 दिन तक चली मैराथन सुनवाई

शीर्ष अदालत ने 40 दिन तक चली मैराथन सुनवाई के बाद आज सुनाए गए बहुप्रतीक्षित निर्णय में कहा, ‘‘यह विवाद अचल संपत्ति के ऊपर है। अदालत स्वामित्व का निर्धारण धर्म या आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर करती है।’’

उच्चतम न्यायालय के इतिहास में दूसरी सबसे लंबी सुनवाई

यह सुनवाई उच्चतम न्यायालय के इतिहास में दूसरी सबसे लंबी सुनवाई है। न्यायमूर्ति गोगोई 17 नवंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल थे।

निर्णय में कही गयी ये बातें

निर्णय में कहा गया, ‘‘संभावनाओं के संतुलन पर, स्पष्ट साक्ष्य है जो संकेत देता है कि बाहरी हिस्से में हिन्दू पूजा करते थे जो 1857 से पहले भी निर्बाध जारी थी जब अंग्रेजों ने अवध क्षेत्र को अपने साथ जोड़ लिया।’’ पीठ ने कहा, ‘‘मुस्लिम ऐसा कोई सबूत पेश नहीं कर पाए जिससे संकेत मिले कि 1857 से पहले मस्जिद पूरी तरह उनके कब्जे में थी।’’ इसने कहा, ‘‘हिन्दुओं का यह विश्वास निर्विवाद है कि ढहाए गए ढांचे की जगह ही भगवान राम का जन्म हुआ था।’’

संविधान पीठ ने 1045 पन्नों का फैसला दिया

न्यायालय ने कहा कि हिन्दू यह साबित करने में सफल रहे हैं कि विवादित ढांचे के बाहरी बरामदे पर उनका कब्जा था और उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड अयोध्या विवाद में अपना मामला साबित करने में विफल रहा है। पीठ ने कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण के साक्ष्यों को महज राय बताना इस संस्था के साथ अन्याय होगा। इसने कहा कि विवादित ढांचे में ही भगवान राम का जन्म होने के बारे में हिन्दुओं की आस्था अविवादित है।

यही नहीं, सीता रसोई, राम चबूतरा और भण्डार गृह की उपस्थिति इस स्थान के धार्मिक तथ्य की गवाह हैं। संविधान पीठ ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान- के बीच बराबर-बराबर बांटने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी की थी।

‘ASI की रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ नष्ट ढांचे के नीच कोई इस्लामी ढांचा नहीं था’

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने विवादित भूमि तीन हिस्सों में बांटने का रास्ता अपनाकर गलत तरीके से मालिकाना हक के मामले का फैसला किया। न्यायालय ने कहा, ‘‘विवादित भूमि राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी जमीन है।’’ इसने कहा, ‘‘यह तथ्य कि नष्ट ढांचे के नीचे मंदिर था, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट से स्थापित हुआ है और नीचे का ढांचा कोई इस्लामी ढांचा नहीं था।’’

पीठ ने कहा, ‘‘राजनीतिक और आध्यात्मिक सामग्री के जरिए देश का इतिहास और संस्कृति सच की खोज का केंद्र रहे हैं। इस अदालत से सच की खोज के मुद्दे पर निर्णय करने का अनुरोध किया गया जहां एक की स्वतंत्रता के दूसरे की स्वतंत्रता को प्रभावित करने और विधि के शासन के उल्लंघन से जुड़े दो सवाल थे।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने कहा- ये जनता की जीत

राम लला विराजमान की ओर से बहस करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने इस निर्णय पर प्रतिक्रया व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘यह बहुत ही संतुलित है और यह जनता की जीत है।’’ इस वाद में पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘फैसले का हमारे लिए कोई महत्व नहीं है, इसमें कई विरोधाभास हैं।’’

निर्मोही अखाड़े का दावा हुआ खारिज

इस वाद के एक अन्य पक्षकार निर्मोही अखाड़ा ने कहा कि उसे उसका दावा खारिज होने का कोई अफसोस नहीं है। फैसले के मद्देनजर देश में संवेदनशील स्थानों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सभी समुदायों से फैसले को स्वीकार करने और शांति बनाये रखने की अपील करते हुए कहा कि वे ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के प्रति प्रतिबद्ध रहें जबकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि यह निर्णय सामाजिक ताने-बाने को सुदृढ़ करेगा।

कांग्रेस ने कहा- हम फैसले का सम्मान करते हैं

कांग्रेस ने भी कहा कि वह फैसले का सम्मान करती है और अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के पक्ष में है। विहिप के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया ने कहा कि राम मंदिर निर्माण के लिए राम लला की जन्म स्थली को राम मंदिर के लिये दिया जाना लाखों कार्यकर्ताओं के त्याग का सम्मान है। प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने भी लोगों से शांति और सौहार्द बनाए रखने की अपील की। हालांकि, उन्होंने निर्णय पर आश्चर्य भी व्यक्त किया।

फैसला सुनाने में लगे 45 मिनट

दारूल उलूम, देवबंद के मौजूदा मोहतमिम मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी ने कहा, ‘‘मैं फैसला देखकर दंग रह गया। मेरा मानना है कि मस्जिद के पक्ष में पर्याप्त सबूत थे, लेकिन इन पर विचार नहीं किया गया।’’ दिल्ली पुलिस के अनुसार निर्णय के मद्देनजर समूची राष्ट्रीय राजधानी में निषेधाज्ञा जारी की गई है। वहीं, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक आपात अभियान केंद्र स्थापित किया गया है जिससे कि मीडिया, सोशल मीडिया और अन्य स्रोतों पर नजर रखी जा सके। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने वकीलों और पत्रकारों से खचाखच भरे न्यायालय कक्ष में इस बहुप्रतीक्षित फैसले के मुख्य अंश पढ़कर सुनाए तथा इसमें उन्हें 45 मिनट लगे।

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