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बुराड़ी केस: रजिस्टर से मिले 11 मौत के राज़, हुए चौंकाने वाले खुलासे

रविवार को मामला सामने आने के बाद से क्राइम ब्रांच की टीम कई बार घर की तलाशी ले चुकी है। बुधवार को टीम ने एक बार फिर घर और दुकान की तलाशी ली। तलाशी में पुलिस को परिवार के छोटे बेटे ललित की दुकान से कुछ रजिस्टर और बच्चों की किताबें बरामद की हैं।

IndiaTV Hindi Desk IndiaTV Hindi Desk
Updated on: July 05, 2018 9:32 IST
बुराड़ी केस: रजिस्टर से मिले 11 मौत के राज़, हुए चौंकाने वाले खुलासे- India TV
बुराड़ी केस: रजिस्टर से मिले 11 मौत के राज़, हुए चौंकाने वाले खुलासे

नई दिल्ली: दिल्ली में दिल दहला देने वाले ग्यारह मौतों का सच तलाशने में जुटी दिल्ली पुलिस को कुछ चौंकाने वाली जानकारी मिली है। जानकारी के मुताबिक ग्यारह सालों से तिल तिल कर परिवार के सदस्यों के मन में अंधविश्वास के बीज को बोया जा रहा था। पुलिस को इस मास डेथ के मास्टमांइड ललित की हैंडराइटिंग में कुल ग्यारह रजिस्टर मिले हैं जिसने इस परिवार की मौत की वजहों पर सबको हैरान कर दिया है। दिल्ली के बुराड़ी इलाके में 11 लोगों के शव मिलने की गुत्थी को सुलझाने के लिए दिल्ली क्राइम ब्रांच की टीम दिन रात लगी हुई है।

रविवार को मामला सामने आने के बाद से क्राइम ब्रांच की टीम कई बार घर की तलाशी ले चुकी है। बुधवार को टीम ने एक बार फिर घर और दुकान की तलाशी ली। तलाशी में पुलिस को परिवार के छोटे बेटे ललित की दुकान से कुछ रजिस्टर और बच्चों की किताबें बरामद की हैं। सूत्रों के मुताबिक इन रजिस्टर में बेहद चौंकाने वाली बातें लिखी हैं। पुलिस सूत्रों के मुताबिक ये रजिस्टर 2007 के हैं। यानी ललित 11 साल से रजिस्टर लिख रहा था। तारीख डालकर तकरीबन 200 पेज लिखे गए हैं इन रजिस्टरों में।

सूत्रों की मानें तो 2007 में ललित के पिता भोपाल दास की मौत हुई थी उसके बाद से ही ललित ये दावा करता रहा है कि उसके सपने में अक्सर उसके पिता आते हैं। ये बातें वो परिवार को बताता था। सपने में कही गई पिता की बातों को ललित रजिस्टर में लिखता था। कहा ये जा रहा है कि बाद में ललित के कहने पर भांजी प्रियंका रजिस्टर में लिखने लगी थी। इन रजिस्टरों में से आखिरी रजिस्टर में सबसे आखिरी एंट्री 30 जून 2018 यानी घटना वाले दिन की गई थी। यही लाइनें पूरी घटना का राज़ खोलती है।

डायरी में आखिरी एंट्री में एक पेज पर लिखा है - घर का रास्ता....9 लोग जाल में, बेबे यानी विधवा बहन...मंदिर के पास स्टूल पर...10 बजे खाने का ऑर्डर...मां रोटी खिलाएगी...एक बजे क्रिया, शनिवार-रविवार रात के बीच होगी। साथ ही लिखा है कि मुंह में ठूंसा होगा गीला कपड़ा...हाथ बंधे होंगे। इस पेज पर जो आखिरी लाइन है, उसमें लिखा है कि कप में पानी तैयार रखना, इसका रंग बदलेगा, मैं प्रकट होऊंगा और सबको बचाऊंगा।

रजिस्टर में लिखा है - पट्टियां अच्छे से बंधनी चाहिए, शून्य के अलावा कुछ नहीं दिखना चाहिए। रस्सी के साथ सूती चुन्नियों या साड़ी का प्रयोग करना है। सात दिन बाद पूजा लागातार करनी है, थोड़ी लगन और श्रद्धा से। कोई घर में आ जाए तो अगले दिन गुरुवार या रविवार को चुनिए। रात 12 से एक बीच क्रिया करनी है, ये करते ही तुम्हारे आगे के काम दृढ़ता से शुरू हो जाएंगे। जितनी दृड़ता और श्रद्धा दिखाओगे उतना ही उचित फल मिलेगा।

इसका मतलब ये कि ललित के कहे मुताबिक परिवार के लोगों को यकीन था कि गले में फंदा लगाते ही कोई चमत्कार होगा और उन्हें वो सब हासिल हो जाएगा जिसकी उम्मीद उन्हें ललित ने कल्पनाओं में कराई थी। यानी परिवार के लोगों को यकीन था कि फंदे पर लटकने से उनकी मौत नहीं होगी और सभी बचा लिए जाएंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। बरगद की पेड़ की जड़ों की तरह लटकने में परिवार के सभी सदस्य मारे गए। यानी ये पूरा केस सामूहिक हत्या या सामूहिक आत्महत्या का न होकर अंधविश्वास के चक्कर में हादसे का दिख रहा है।

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