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BLOG: किसानों का कौन?

इस बार किसानों की माँग थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर संसद में बहस हो। जिसमें सिर्फ़ किसानों के क़र्ज या फसल की कीमतों पर ही नहीं, बल्कि समूचे कृषि संकट पर बात हो। 

IndiaTV Hindi Desk IndiaTV Hindi Desk
Published on: December 07, 2018 23:44 IST
Farmers Agitation file photo- India TV
Farmers Agitation file photo

हाल ही में देशभर के किसान अपनी माँगों को लेकर दिल्ली में इस उम्मीद से इकट्ठा हुए कि उनकी माँगों को केन्द्र सरकार द्वारा मान लिया जाएगा। लेकिन हुआ वही जो हर बार होता है। किसानों को वापस लौटना पड़ा और उनकी समस्याओं पर चर्चा बन्द हो गई। वो सारे नेता जो किसानों की रैली में हाथ से हाथ जोड़कर फ़ोटो खिंचवाये थे। उनमें से कुछ चुनाव प्रचार में व्यस्त हो गए और कुछ इस उम्मीद में अपने राज्य लौट गए कि फिर फ़ोटो खिंचवाने का मौका तो आएगा ही। 

इस बार किसानों की रैली हर बार की तरह नहीं थी। पहले किसानों की माँग होती थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए, लेकिन इस बार किसानों की माँग थी कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर संसद में बहस हो। जिसमें सिर्फ़ किसानों के क़र्ज या फसल की कीमतों पर ही नहीं, बल्कि समूचे कृषि संकट पर बात हो। साथ ही ऑल इण्डिया किसान संघर्ष समिति द्वारा क़र्जा मुक्ति बिल और एमएसपी का बिल ड्राफ़्ट किया गया था। जिस पर बहस के लिए संसद का कम से कम तीन हफ़्ते का स्पेशल सेशन हो। अब हम सबको उस दिन का इन्तज़ार करना चाहिए कि कब कृषि की समस्याओं पर बहस के लिए संसद का स्पेशल सेशन बुलाया जा रहा है।

किसानों की समस्या वाकई जटिल है, जो एक दिन या एक साल में तो नहीं जाएगा। लेकिन विपक्षी दलों के नेताओं के भाषण सुनने के बाद ऐसा लगता है कि क़र्ज माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में जो एमएसपी तय करने की प्रक्रिया बताई गई है, को लागू कर देने से सारी समस्याओं का निदान हो जाएगा। 30 नवम्बर 2018 के दिन जब किसानों की रैली में राहुल गाँधी, अरविन्द केजरीवाल, सीताराम येचुरी, शरद यादव, फ़ारुक़ अब्दुल्लाह वग़ैरह-वग़ैरह फ़ोटो सेशन से पहले किसानों की क़र्ज माफ़ी को किसानों की समस्या का समाधान बता रहे थे, उसी दिन प्रोफ़ेसर स्वामीनाथन ने अपनी वेबसाइट पर लिखा कि “ I only feel sorry that in the election politics solutions like loan waiver are given importance. The basic difficulties of farmers can be overcome only if integrated attention is given to pricing, procurement and public distribution. Compounding the difficulties of today,farmers are facing serious problems from climate change.” क्या आपने कभी किसी नेता को बदले मौसम से किसानों को होने वाली समस्याओं पर बात करते सुना है? क्यों सूख़ाग्रस्त इलाक़ों से किसानों के द्वारा जल संचय की प्रक्रिया अपनाने की बड़े पैमाने पर कोई तस्वीरें सामने नहीं आती है? सुखाग्रस्त इलाक़ों के किसानों को भी सोचना पड़ेगा कि उनके इलाक़े में पानी का जलस्तर कैसे बढ़ेगा?

मोदी सरकार ने किसानों की क़र्ज माफ़ी और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में  एमएसपी तय करने की प्रक्रिया पर अपना रुख़ पहले ही साफ़ कर दिया है। साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल करके कह दिया था कि लागत पर 50 प्रतिशत अधिक नहीं दिया जा सकता, क्योंकि ये बाज़ार ख़राब कर देगा। Indiatvpaisa.com पर 20 जून 2017 को ही छपा है कि जब पंजाब सरकार ने 10 लाख़ किसानों के क़र्ज माफ़ किए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। तब केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ़-साफ़ कह दिया था कि केन्द्र सरकार किसानों के क़र्ज माफ़ किए जाने के प्रस्ताव पर विचार नहीं कर रही है। इससे पहले जब महाराष्ट्र और यूपी सरकार ने भी किसानों की क़र्ज माफ़ी का एलान किया था, तब 12 जून को भी वित्त मंत्री ने कह दिया था कि केन्द्र राज्यों को क़र्ज माफ़ी के लिए सहायता नहीं देगा और अगर वे ऋण माफ़ करते हैं तो उसके लिए धन की व्यवस्था उन्हें अपने कोष से करनी पड़ेगी।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी हर राज्य के चुनावी भाषण में कह रहें है कि अगर कांग्रेस की सरकार बनी तो 10 दिनों के भीतर किसानो का क़र्ज माफ़ करेंगे। लेकिन वर्तमान में जिस राज्य में उनकी सरकार है,वहाँ क्या हालत ये जानना ज़रूरी है। 17 मई 2018 के एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ 24 घंटे के भीतर पंजाब के भठिंडा ज़िले के अलग-अलग गाँवों के 5 किसानों ने क़र्ज की वजह से आत्महत्या कर ली और किसी भी मृतक परिवार से मिलने पंजाब का एक भी मंत्री नहीं गया। पंजाब में ही गन्ना किसान लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। 

05 नवम्बर 2018 की रिपोर्ट है कि कर्नाटक में किसानों द्वारा क़र्ज चुकाने में देरी की वजह से बैंकों द्वारा अरेस्ट वारंट भेजा जा रहा है। जिसको लेकर किसान गुस्से में हैं और विधानसभा को घेरने की धमकी भी दिए हैं। स्वामीनाथन आयोग ने यूपीए-1 के कार्यकाल में चार रिपोर्ट क्रमश: दिसम्बर 2004,अगस्त 2005,दिसम्बर 2005 और अप्रैल 2006 में सौंप दिए थे। अक्टूबर 2006 में अन्तिम और पांचवे रिपोर्ट को सौंपते वक़्त कहा था कि यदि 11 वर्षीय प्लान के साथ काम किया गया तो कृषि में जल्दी और अच्छी विकास होगी। लेकिन कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में किसानों के लिए क्या किया कौन नहीं जानता है।

ब्लॉग लेखक इंडिया टीवी न्यूज चैनल में कार्यरत हैं और इस लेख में व्यक्त उनके निजी विचार हैं

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