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  5. 'मालगुड़ी डेज़' से लेकर 'एक था टाइगर' तक गिरीश कर्नाड ने अपनी बेहतरीन अदाकारी से जीता सबका दिल, देखें शानदार तस्वीरें

'मालगुड़ी डेज़' से लेकर 'एक था टाइगर' तक गिरीश कर्नाड ने अपनी बेहतरीन अदाकारी से जीता सबका दिल, देखें शानदार तस्वीरें

India TV Photo Desk India TV Photo Desk
Updated on: June 10, 2019 13:32 IST
  • जाने माने लेखक और दक्षिण भारतीय रंगमंच के पुरोधा गिरीश काफी समय से बीमार चल रहे थे और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वो 10 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं और दक्षिण भारतीय रंगमंच और फिल्मों का पितामह माना जाता था। गिरीश हमारे बीच नहीं रहे।
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    जाने माने लेखक और दक्षिण भारतीय रंगमंच के पुरोधा गिरीश काफी समय से बीमार चल रहे थे और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वो 10 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं और दक्षिण भारतीय रंगमंच और फिल्मों का पितामह माना जाता था। गिरीश हमारे बीच नहीं रहे।

  • गिरीश कर्नाड भारत में 8 ज्ञानपीठ सम्मान पाने वाले लोगों में से एक थे। आर के नारायण की 'मालगुड़ी डेज़' में उन्होंने स्वामी के पिता का किरदार भी निभाया था। उनके द्वारा लिखे गए - हयावदना, ययाति, तुगलक जैसे नाटक को बतौर सिलेबस कर्नाटक और अन्य राज्यों में पढ़ाया जाता है।
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    गिरीश कर्नाड भारत में 8 ज्ञानपीठ सम्मान पाने वाले लोगों में से एक थे। आर के नारायण की 'मालगुड़ी डेज़' में उन्होंने स्वामी के पिता का किरदार भी निभाया था। उनके द्वारा लिखे गए - हयावदना, ययाति, तुगलक जैसे नाटक को बतौर सिलेबस कर्नाटक और अन्य राज्यों में पढ़ाया जाता है।

  • गिरीश कार्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को माथेरान, महाराष्ट्र में हुआ था। वे भारत के जाने माने लेखक, अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक और नाटककार थे। कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा दोनों के ही जानकार थे। गिरीश कर्नाड को 1998 में ज्ञानपीठ सहित पद्मश्री व पद्मभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। कार्नाड द्वारा रचित तुगलक, हयवदन, तलेदंड, नागमंडल व ययाति जैसे नाटक काफी लोकप्रिय हुये और भारत की अनेकों भाषाओं में इनका अनुवाद व मंचन हुआ है।
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    गिरीश कार्नाड का जन्म 19 मई, 1938 को माथेरान, महाराष्ट्र में हुआ था। वे भारत के जाने माने लेखक, अभिनेता, फ़िल्म निर्देशक और नाटककार थे। कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा दोनों के ही जानकार थे। गिरीश कर्नाड को 1998 में ज्ञानपीठ सहित पद्मश्री व पद्मभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। कार्नाड द्वारा रचित तुगलक, हयवदन, तलेदंड, नागमंडल व ययाति जैसे नाटक काफी लोकप्रिय हुये और भारत की अनेकों भाषाओं में इनका अनुवाद व मंचन हुआ है।

  • गिरीश कर्नाटक आर्ट कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड जाकर आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर भारत लौट आए। चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में सात साल तक काम किया। इस दौरान जब काम में मन नहीं लगा तो नौकरी से इस्तीफा दे दिया। 
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    गिरीश कर्नाटक आर्ट कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड जाकर आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर भारत लौट आए। चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में सात साल तक काम किया। इस दौरान जब काम में मन नहीं लगा तो नौकरी से इस्तीफा दे दिया। 

  • इसके बाद वे थियेटर के लिए समर्पित होकर काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में प्रोफेसर के रूप में काम किया। जब वहां जमा नहीं तो दोबारा फिर भारत का रुख किया। इस बार उन्होंने भारत में रुकने का मन बना लिया था और वो पूरी तरह साहित्य और फिल्‍मों से जुड़ गए। इस दौरान उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में कई फिल्में बनाई। 
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    इसके बाद वे थियेटर के लिए समर्पित होकर काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में प्रोफेसर के रूप में काम किया। जब वहां जमा नहीं तो दोबारा फिर भारत का रुख किया। इस बार उन्होंने भारत में रुकने का मन बना लिया था और वो पूरी तरह साहित्य और फिल्‍मों से जुड़ गए। इस दौरान उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में कई फिल्में बनाई। 

  • गिरीश कर्नाड  को10 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं और दक्षिण भारतीय रंगमंच और फिल्मों का पितामह माना जाता था।
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    गिरीश कर्नाड  को10 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं और दक्षिण भारतीय रंगमंच और फिल्मों का पितामह माना जाता था।

  •   1938 में जन्मे गिरीश कर्नाड के पूरे सफर को देखें तो वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे। उन्होंने खुद को महज एक्टर, फिल्मकार, लेखक और नाटककार की भूमिका तक ही सीमित नहीं रखा। वह कलाकार के साथ चर्चित एक्टिविस्ट भी रहे. सरकार किसी की भी हो, वह हमेशा मुखर रहे। राजनीतिक मसलों पर भी बेबाक राय रखते थे।
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    1938 में जन्मे गिरीश कर्नाड के पूरे सफर को देखें तो वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे। उन्होंने खुद को महज एक्टर, फिल्मकार, लेखक और नाटककार की भूमिका तक ही सीमित नहीं रखा। वह कलाकार के साथ चर्चित एक्टिविस्ट भी रहे. सरकार किसी की भी हो, वह हमेशा मुखर रहे। राजनीतिक मसलों पर भी बेबाक राय रखते थे।

  • 2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही गिरीश कर्नाड बेंगलूरु सीट से कांग्रेस प्रत्याशी नंदन नीलकेणि के समर्थन में कैंपेनिंग करने उतरे थे, मगर उन्होंने मोदी की सफलता का ठीकरा कांग्रेस की अगुवाई वाली पिछली यूपीए सरकार पर फोड़ने में कोताही नहीं बरती।  
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    2014 के लोकसभा चुनाव में भले ही गिरीश कर्नाड बेंगलूरु सीट से कांग्रेस प्रत्याशी नंदन नीलकेणि के समर्थन में कैंपेनिंग करने उतरे थे, मगर उन्होंने मोदी की सफलता का ठीकरा कांग्रेस की अगुवाई वाली पिछली यूपीए सरकार पर फोड़ने में कोताही नहीं बरती।

     

  • गिरीश कर्नाड ने तुगलक नामक चर्चित नाटक लिखा था, उस वक्त देश, आजादी के समय के गांधीवादी मॉडल से नेहरूवियन मॉडल की तरफ शिफ्ट कर चुका था। नाटक के कई दृश्यों को देखने के बाद कुछ लोगों को लगा कि यह देश में नेहरूवादी मॉडल की आलोचना है।  
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    गिरीश कर्नाड ने तुगलक नामक चर्चित नाटक लिखा था, उस वक्त देश, आजादी के समय के गांधीवादी मॉडल से नेहरूवियन मॉडल की तरफ शिफ्ट कर चुका था। नाटक के कई दृश्यों को देखने के बाद कुछ लोगों को लगा कि यह देश में नेहरूवादी मॉडल की आलोचना है।

     

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