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ऋण शोधन पर RBI के सर्कुलर को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज, समय पर कर्ज न चुकाने वाली कंपनियों को मिली राहत

जस्टिस आर एफ नरीमन ने अपने फैसले में कहा कि हमने आरबीआई के सर्कुलर को असंवैधानिक घोषित किया है।

India TV Paisa Desk
India TV Paisa Desk 02 Apr 2019, 17:43:02 IST

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा पिछले साल जारी किए गए उस सर्कुलर को खारिज कर दिया है, जिसमें कर्ज लौटाने में एक दिन की भी चूक पर किसी कंपनी को दिवालिया घोषित करने का प्रावधान किया गया है।

जस्टिस आर एफ नरीमन ने अपने फैसले में कहा कि हमने आरबीआई के सर्कुलर को असंवैधानिक घोषित किया है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 12 फरवरी, 2018 को एक सर्कुलर जारी कर कहा था कि बैंकों को 2000 करोड़ रुपए और इससे अधिक के बड़े खाते के मामले में एक दिन की भी चूक की स्थिति में दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता कानून के तहत 180 दिनों के भीतर ऋण समाधान योजना पेश करनी होगी।

इसमें कहा गया था कि यदि 27 अगस्‍त तक की निर्धारित अवधि में कोई समाधान नहीं तलाशा जा सके तो गैर निष्‍पादित आस्तियां (एनपीए) खातों को राष्‍ट्रीय कंपनी विधि प्राधिकरण के समक्ष रखा जाए। हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान, शीर्ष अदालत ने पिछले साल 11 सितंबर को बैंकों से इस सर्कुलर पर यथास्थिति बनाए रखने और डिफॉल्‍ट करने वाली कंपनियों के खिलाफ दिवालियेपन की कार्रवाई शुरू न करने का निर्देश दिया था।

विशेषज्ञों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फंसे कर्ज के समाधान पर जारी सर्कुलर को रद्द करने के आदेश से बिजली कंपनियों के साथ-साथ बैंकों को भी राहत मिलेगी। इसके साथ कर्ज के पुनर्गठन में लचीलापन आएगा। लेकिन इससे ऋण शोधन कार्यवाही धीमी होगी।

जे सागर एसोसिएट्स के भागीदार वी मुखर्जी ने शीर्ष अदालत के आदेश के बाद कहा कि आरबीआई को दबाव वाली संपत्ति के पुनर्गठन को लेकर संशोधित दिशानिर्देश जारी करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि जारी प्रक्रिया को लेकर भी सवाल है। कुछ मामलों में प्रक्रिया या तो पूरी हो चुकी है या पूरी होने के करीब है, हालांकि इससे बिजली कंपनियों के साथ बैंकों को कुछ राहत मिलेगी। साथ ही कर्ज पुनर्गठन को लेकर बैंकों को लचीलापन मिलेगा।

सिरील अमरचंद मंगलदास के प्रबंध भागीदारी सिरील श्राफ ने इसे बड़ा निर्णय बताया। उन्होंने कहा कि हालांकि इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी लेकिन अगर बैंक स्वेच्छा से आईबीसी (दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता) के प्रावधानों का उपयोग करते हैं तो भी व्यवहारिक प्रभाव कम होगा। 

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