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Reservation for upper castes: क्या सुप्रीम कोर्ट में टिक पाएगा सवर्ण आरक्षण?

सरकार आरक्षण देने की तैयारी तो कर चुकी है लेकिन कानूनी जानकार बताते हैं कि रास्ता आसान नहीं है। इसके लिए सरकार को संविधान में संशोधन करवाना पड़ेगा। संविधान संशोधन के लिए पहले बिल को संसद के दोनों सदनों में पास करना होगा जिसके बाद संसद के सभी सदस्यों का बहुमत या संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत से पारित करना ज़रूरी होगा।

IndiaTV Hindi Desk
IndiaTV Hindi Desk 08 Jan 2019, 9:04:08 IST

नई दिल्ली: मोदी कैबिनेट ने आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों के लिए दस फीसदी आरक्षण का फैसला करके एक ओर जहां देश में अलग अलग जगहों पर आरक्षण के लिए आंदोलन कर रहे लोगों को साधा है वहीं दूसरी ओर विरोधियों को भी चारों खाने चित करने की कोशिश की है लेकिन सरकार के सामने अब चुनौती है इसके लिए संविधान में संशोधन करवाना और कोर्ट की चुनौती को पार करना। अपने कई फैसलों में सुप्रीम कोर्ट साफ कह चुका है कि कुल मिलाकर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता।

अभी मौजूदा स्थिति में अनुसूचित जाति को 15%, अनुसूचित जनजाति को 7.5% और अन्य पिछड़ा वर्ग को 27% फीसदी आरक्षण मिल रहा है। कुल मिलाकर 49.5% आरक्षण दिया जा चुका है लेकिन सरकार को पिछले कई सालों से जगह-जगह आरक्षण आंदोलन का सामना करना पड़ रहा है राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा में जाट, गुजरात में पाटीदार और महाराष्ट्र में धनगर आरक्षण की मांग कर रहे हैं।

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सरकार आरक्षण देने की तैयारी तो कर चुकी है लेकिन कानूनी जानकार बताते हैं कि रास्ता आसान नहीं है। इसके लिए सरकार को संविधान में संशोधन करवाना पड़ेगा। संविधान संशोधन के लिए पहले बिल को संसद के दोनों सदनों में पास करना होगा जिसके बाद संसद के सभी सदस्यों का बहुमत या संसद के दोनों सदनों के 2/3 बहुमत से पारित करना ज़रूरी होगा। उसके बाद देश के कम से कम 50 फीसदी राज्यों के विधानसंडल से बिल पास करवाना होगा। विधानमंडलों से पास होने के बाद राष्ट्रपति की मुहर लगना ज़रूरी होगा।

संसद की जंग अगर मोदी सरकार पार कर लेती है तो राज्यों के विधानमंडलों से इसे पास करवाने में उसे बड़ी परेशानी नहीं आएगी लेकिन अभी रास्ते में एक और चुनौती आ सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए 50 फीसदी की सीमा तय कर रखी है। आरक्षण आंकड़ा 50 फीसदी को पार करता है तो सुप्रीम कोर्ट जूडिशल स्क्रूटनी करेगा। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बैंच ने 1992 में पिछड़ेपन की परिभाषा दी थी। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद-16 (4) कहता है कि पिछड़ेपन का मतलब सामाजिक पिछड़ेपन से है।

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की लिमिट बढ़ने के मामलों पर फैसले दिये हैं और हर उस आरक्षण को खारिज कर दिया जो 50 फीसदी की लिमिट क्रॉस कर रहा था। मोदी सरकार इसे संविधान की 9वीं अुनसूचि में डाल सकती है लेकिन वो भी अब सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर नहीं है।

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