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पद्मावत को लेकर क्यों बरपा है हंगामा? कौन हैं राजपूत और क्या है उनका इतिहास?

चिंता को तलवार की नोक पर रखे वो राजपूत... रेत की नाव लेके समुद्र से शर्त लगाए वो राजपूत... और जिसका सर कटे फिर भी धड़ दुश्मन से लड़ता रहे वो राजपूत...

IndiaTV Hindi Desk
Edited by: IndiaTV Hindi Desk 25 Jan 2018, 12:21:01 IST

नई दिल्ली: संजय लीला भंसाली की बहुचर्चित फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर राजपूत संगठन और करणी सेना पिछले करीब चार-पांच महीने से उग्र प्रदर्शन कर रही है। उनका कहना है कि इस फिल्म में राजपूतों के इतिहास से छेड़छाड़ की गई है जबकि फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली इसे सही नहीं मानते हैं। ...तो इस फिल्म को लेकर हो रहे उग्र प्रदर्शन के केन्द्र में है राजपूतों का इतिहास जिनकी वीरता व परक्रम का भारतीय इतिहास में अद्वितीय स्थान है। एक हजार साल पहले तक उत्तर भारत के ज्यादातर हिस्से पर राजपूत राजाओं का शासन था।

राजपूत उत्तर भारत का एक क्षत्रिय कुल माना जाता है जो कि राजपुत्र का अपभ्रंश है। राजस्थान को ब्रिटिशकाल मे राजपूताना भी कहा गया है। पुराने समय में आर्य जाति में केवल चार वर्णों की व्यवस्था थी। राजपूत काल में प्राचीन वर्ण व्यवस्था समाप्त हो गयी थी तथा वर्ण के स्थान पर कई जातियाँ व उप जातियाँ बन गईं थीं। कवि चंदबरदाई के कथनानुसार राजपूतों की 36 जातियाँ थी। उस समय में क्षत्रिय वर्ण के अंतर्गत सूर्यवंश और चंद्रवंश के राजघरानों का बहुत विस्तार हुआ। राजपूतों में मेवाड़ के महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान का नाम सबसे ऊंचा है।

सदियों तक चले उनके शासन में राजपूतों ने कई महल बनवाए। हर्षवर्धन के उपरान्त भारत मे कोई भी ऐसा शक्तिशाली राजा नहीं हुआ जिसने भारत के बृहद भाग पर एकछत्र राज्य किया हो। इस युग मे भारत अनेक छोटे बड़े राज्यों में विभाजित हो गया जो आपस मे लड़ते रहते थे। इनके राजा राजपूत कहलाते थे तथा सातवीं से बारहवीं शताब्दी के इस युग को राजपूत युग कहा गया है।

राजपूतों की उत्पत्ति के संबंध मे इतिहास में दो मत प्रचलित हैं। कर्नल टोड व स्मिथ आदि के अनुसार राजपूत वह विदेशी जातियाँ है जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया था। उच्च श्रेणी के विदेशी राजपूत कहलाए, चंद्रबरदाई लिखते हैं कि परशुराम द्वारा क्षत्रियों के सम्पूर्ण विनाश के बाद ब्राह्मणों ने माउंट आबू पर यज्ञ किया व यज्ञ कि अग्नि से चौहान, परमार, प्रतिहार व सोलंकी राजपूत वंश उत्पन्न हुये।

इसे इतिहासकार विदेशियों के हिन्दू समाज में विलय हेतु यज्ञ द्वारा शुद्धिकरण की पारंपरिक घटना के रूप मे देखते हैं। दूसरी ओर गौरीशंकर हीराचंद ओझा आदि विद्वानों के अनुसार राजपूत विदेशी नहीं है अपितु प्राचीन क्षत्रियों की ही संतान हैं। राजपूत युग कि वीरता व परक्रम का भारतीय इतिहास मे अद्वितीय स्थान है। वीरता, उदारता, स्वातंत्रय प्रेम, देशभक्ति जैसे सदगुणों के साथ उनमें मिथ्या कुलाभिमान तथा एकताबद्ध होकर कार्य करने की क्षमता के अभाव के दुर्गुण भी थे। मुसलमानों के आक्रमण के समय राजपूत हिन्दू धर्म, संस्कृति और परम्पराओं के रक्षक बनकर सामने आते रहे।

दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी (शासनकाल,1296-1316) ने पूर्वी राजस्थान में चित्तौड़गढ़ और रणथम्भौर के दो महान् राजपूत दुर्गों को जीत लिया, लेकिन वह अपने नियंत्रण में नहीं रख सके। मेवाड़ के राजपूत राज्य ने राणा साँगा के नेतृत्व में अपनी प्रभुत्ता बनाए रखने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें मुग़ल बादशाह बाबर ने खानवा (1527) में पराजित कर दिया। बाबर के पोते अकबर ने चित्तौड़गढ़ और रणथम्भौर के क़िले जीत लिए (1568-69) और मेवाड़ को छोड़कर सभी राजस्थानी राजकुमारों के साथ एक समझौता किया।

मुग़ल साम्राज्य की प्रभुता स्वीकार कर, ये राजकुमार दरबार तथा बादशाह की विशेष परिषद में नियुक्त कर लिए गए और उन्हें प्रान्तीय शासकों के पद व सेना की कमानें सौंपी गईं। हालाँकि बादशाह औरंगज़ेब (शासनकाल, 1658-1707) की असहिष्णुता से इस व्यवस्था को नुक़सान पहुँचा, लेकिन इसके बावजूद 18वीं सदी में मुग़ल साम्राज्य का पतन होने तक यह क़ायम रही।

राजपूतों ने मुसलमान आक्रमाणियों से शताब्दियों तक वीरतापूर्वक युद्ध किया। यद्यपि उनमें परस्पर एकता के अभाव के कारण भारत पर अन्तत: मुसलमानों का राज्य स्थापित हो गया, तथापि उनके तीव्र विरोध के फलस्वरूप इस कार्य में मुसलमानों को बहुत समय लगा। दीर्घकाल तक मुसलमानों का विरोध और उनसे युद्ध करते रहने के कारण राजपूत शिथिल हो गए और उनकी देशभक्ति, वीरता तथा आत्म-बलिदान की भावनाएँ कुंठित हो गईं।

यही कारण है कि भारत में अंग्रेज़ी राज्य की स्थापना के विरुद्ध किसी भी महत्त्वपूर्ण राजपूत राज्य अथवा शासक ने कोई युद्ध नहीं किया। इसके विपरीत 1817 और 1820 ई. के बीच सभी राजपूत राजाओं ने स्वेच्छा से अंग्रेज़ों की सर्वोपरि सत्ता स्वीकार करके अपनी तथा अपने राज्य की सुरक्षा का भार उन पर छोड़ दिया। स्वतंत्रता (1947) के बाद राजस्थान के राजपूत राज्यों का भारतीय संघ के राजस्थान राज्य में विलय कर दिया गया।

चिंता को तलवार की नोक पर रखे वो राजपूत... रेत की नाव लेके समुद्र से शर्त लगाए वो राजपूत... और जिसका सर कटे फिर भी धड़ दुश्मन से लड़ता रहे वो राजपूत...

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Web Title: पद्मावत को लेकर क्यों बरपा है हंगामा? कौन हैं राजपूत और क्या है उनका इतिहास? - Padmaavat row and the history of Rajputs